Thursday, March 5, 2026

"पारदर्शी पिचकारी"

"पारदर्शी पिचकारी"

ये कुछ रंग बच गए, कहीं बेगाने जच गए
कुछ खास रह गए , यादें पास रख गए

आज रंग समेटते याद आ गई, बचपन की मनमानी
बढिया थी वो पिचकारी, जिसमे दिखता था पानी

कभी भीगते कभी भीगाते, किसकी क्या फिकर
गली के हुडदंगियों में, अपना भी था जिकर

स्कूटर पर उल्टा टंगे तीनो बहन भाई का टोला
किसका चपडा, किसका शेक, किसका अंटीकोला

रे सुन, अरे रुक, कहती आवाज अब है पुरानी
रंगीन तंग गलियों में थी, हर दिन नई कहानी
बढिया थी वो पिचकारी, जिसमे दिखता था पानी

कश्यप द्विवेदी

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