Thursday, March 20, 2025

बिसरी बात

गए, कल फिर वही बात हुई 
बिसरी, सहसा फिर साथ हुई 

अंजान सा मैं, चुप था मगर 
धीरे से ही सही, पर कुछ बात हुई 

पूछा उसने, कैसे हो 
अब तो चैन से सोते हो? 

ठहाके से ही सच 
बिन बात ही निकल गया 

पहले सपने आते थे 
दिन यादों में निकलते 
शाम मुलाक़ातों में

अब अपनी में मशगूल 
दिन भर अपनों में होता हूँ 
रात में गहरा सोता हूं 

सोच कर, ठिठकी, 
कहती तो क्या मैं पराई थी? 

मौन हो एक पल कहा 
जो थी तुम, उसकी मिसाल नहीं 
एक हसीन कहानी जिसे साथ लिखा 
वो कहानी पराई नहीं 

सुलगा के कश लेते 
देख ती एक टक मुझे 
कि कहीं मिल जाए नज़र 
तो बात, तो हो 
कश के बहाने से ही सही 
कुछ और पल हम तुम साथ तो हो 

कशमकश में आज भी
मौका ढूंढ लिया था उसने 
बेपरवाह एक रोज़ 
फ़रेब कर दिया था जिसने 

इश्क कहूँ, या कहु फ़िक्र 
जिसका कभी था हर बात में जिक्र 
चुप ही रहा, परवाह आज भी 
क्या हुआ क्यों हुआ, वो राज़ आज भी 

खामोशी का शोर लीजिए 
मन से ढेरों दुआ दिये 
निकल चला निशब्द ही 
धीरे से ही सही 
कल कुछ बात तो हुई



कश्यप द्विवेदी

Friday, October 11, 2024

शिकायत

कहता हैं, बदल गई हो तुम,
पहले सा, अब कुछ नहीं 

मैं हाज़िर, कह गई जवाब में 
तुम सा हसीं, कोई और नहीं 

चुप था शिकायती, क्षणिक
फिर बोला...

"कि, शिकवा ही तो की, 
जब की, तुझको तेरी,

तो, लिख लो हिसाब में कहीं,..

चुका देना, कभी, कर शिकायत,
गर मिल जाए, मेरी...."

कश्यप द्विवेदी

Monday, July 26, 2021

इत्र

कहां हो ? नाराज़ हो ?
या.. यूं ही.. बेपरवाह..

छुपी हो, समेट कर
बेखुदी की बेतुकी वजह

तेरे इत्र की कपास, न जाने
कबसे मेरे पास है

जो रोक रही है वजह..
वही सबसे खास है..



कश्यप द्विवेदी

Tuesday, March 16, 2021

छलकती स्याही यादों की

महकती यादों के गुल
बाग से चुनता रहता हूं

इक याद तुम्हारी, ही वजह
जो ख्वाब पिरोता रहता हूं

मखमली सुबह हो या
सुहानी शाम का आलम

हर दिन सुन्हरी धूप में
ठंडी छांव किये बैठा हूं

सोच तुम्हें, सफेद पन्नों पर
लिखता हुं हर रोज कलम

देर हुई, गम नहीं, राह तुम्हारी एकटक
देख बार बार मैं, गीत लिखता रहता हूं

मसि छलक स्याही सा, बेचैन मैं उसाही
गर तुम नहीं फिर, इंतज़ार ही सही

कश्यप द्विवेदी

Saturday, March 6, 2021

डाफ़ाचूक (confused) मेवाडी भाषा में एक कोशिश

मालण पोए मोगरा, वी गजरा री ठाठ
कमल, हजारी ढुंढता, जो मैं किदी वात

पुछे मने अचान चुंक, कंणिने पेराओगा
पुजारी हो प्रेम रा, या मिंदर ही ले जाओगा

डबका खाता संपट लेता, हमजियो वंडी वात
देदे मोगरा संग गुलाब, पंखुड़ी रखजे हात

काठो मन, कर हिम्मत, जद किदो मै हिसाब
मुक, उतरी सुरत मारी, नी हो कोई जवाब

बोली मीठा कंठ ऊं पाछी, हुणों मने भी ले जाओगा
आगे जगदी चौक फिरा, पाछा ले आओगा

जो हां कहूं, के ना कहूं, भोलो मुं पुजारी
पडीको मेल थेला मे निकलियो, 
वा पगली गोता खारी


कश्यप द्विवेदी
मुसाफिर

Monday, February 1, 2021

"राबता"

मरम्मत जो की तुमने
मेरे दिल ऐ बेहाल की

तो, पूछता हुं अब, उस रब से
की ईबादत, किसकी करूँ

कहता हे वो भी कमाल, कुछ युं

'गर दिल में बसी हो, तो कर मेरी
जो दिल दे बैठा हो, तो उसका हो जा'

तेरा दिल अब तेरा कहां
जिसे इश्क है, मुसाफिर
उसका कोई रब कहां

कश्यप द्विवेदी
(मुसाफिर)

Thursday, January 7, 2021

कहां हो यारों


न जाने कहां, है वो दिन
जब मिलने के बहाने, होते न थे

किस्से कुछ तेरे, कुछ मेरे
सुनने के वादे, पुराने न थे

ढूंढ रहा हुं फिर तुम्हें,
कि वक्त तुम निकाल दो

ऐतबार ही रहा है बाकी, जालिम
तेरी रजामंदी का, इन्तजार करुंगा

मैं तो हूं मुसाफिर
लौट कर फिर यहीं मिलुंगा



कश्यप द्विवेदी