Wednesday, April 8, 2020

मन का मुसाफिर


हुं मन का मुसाफिर, हर राहगीर मेरा हमसफर नहीं,
रास्तों से है इश्क मुझे, मंजिल, मकबरों से नहीं,

वजह तुझे पाने की, कि साथ ले चलुं तुझे
करुं फना वो शौक जो, अब तुझे पसंद नहीं

सब्र खुब है भरा, जो थाम लो अगर मुझे
सही है हर चोट वो, तभी तो टुटता नहीं,

रुका हुं कुछ देर और, जो मन करे गर तेरा
लुं साथ रंग और कुछ, वो चित्र जो बना नहीं

उस ओर तेरे यार और, ईधर हो यकीन तेरा
हुं मन का मुसाफिर, रकीब तु नहीं मेरा

कश्यप द्विवेदी

Tuesday, April 7, 2020

तेरी मेरी कल की बातें

उन खो गई सी खुशबूओं को, मेहफूज फिर से कर लिया
खनखनाती प्यालियों को, फैज़ हमनें कर दिया

क्या अब भी उस अलाव सी, धधक रही हो तुम कहीं
बिसरी हर बात पर, खामोश, खफा, तुम सही

लो आज करें फैसला, बांधे फिर हौंसला, लिखें पंक्ति फिर नयी
मिटा शिकवे ठान लें, न थी तुम गलत, न था मैं सही


कश्यप द्विवेदी

Monday, March 9, 2020

रंगीन मिजाज - नकाबपोश


ये रंग भी नकाब है, मलमल नही गुलाल है,
हरपल बदल के चल रही, ये जिंदगी कमाल है,

जो तुम मलो तो, कौन हो ?
जो मैं मलुं तो, मौन हो !

सुनो जरा, वो रंग हरा, छिडक न देना, तुम वहां
जहां वो अजनबी हंसी, वो झांकती सी खिडकियां

याद अब भी है मुझे, वो रंग जो पसंद तुझे
ना कर वो जिद, यकीन कर, न होगी अब वो दूरियां
लगा के रंग, हो मलंग, करे हंसी अठखेलियां


कश्यप द्विवेदी

Monday, February 17, 2020

तुर्की के गलियारे || 1


बेगानी गलियों में, तेरी यादें ढुंढता
भरे बाजारों में तन्हा ही, मैं घुमता

रंग बिरंगे पुतले, चलती फिरती अंगड़ाईयां
पुकारती हर इक नजर, मचलती बेकरारियां

कोई शौकीन, कोई बेचैन, कोई हसीन मुखौटा
मुस्कुराता, सोचकर इन में, कोई तो हमारा होता

तडक भडक साथ साथ, जाना अंजाना चेहरा
बेफिक्र इस शहर मे, न देखा कहीं कोई पेहरा

पशमीना में लिपटी, ना जाने ये क्या बात है
रोक न ले मुझे, अब किसकी, कहां मैं सुनता



कश्यप द्विवेदी

Tuesday, October 20, 2015

द्वन्द

                                                                           "द्वन्द" 

"आज कल पढाई लिखाई जरूरी नहीं, बस काम करना और काम निकलवाना आना चाहिए "
कहते हुए सेठजी अपनी बड़ी सी गाडी में एयरपोर्ट निकल गए । 

नौकरी का  पहला दिन था, सो कागज़ात व फाइल लिए मै भी दफ्तर की और बढ़ा । 

अपने क्यूबिकल डेस्क पर जाकर कुछ पुरानी फाइलें देखने लगा, तभी कुछ सह कर्मियों से जान पहचान हुई । 

लंच करते समय एक सहकर्मी से पता चला की सेठ जी अपने बेटे को लेने एयरपोर्ट गए थे, जो की अमेरिका से व्यवसाय प्रशासन में स्नातकोत्तर कर लौटा है । 

एक दम से मेरे ध्यान में सेठजी का कहा सुबह वाला कथन सामने आगया । क्षण भर में उस द्वन्द से बहार आया तो पता चला की कल से सेठजी के सुपुत्र ही दफ्तर में मेरे साहब होंगे । 

अगले दिन सुबह समय पर दफ्तर पहुंचा तो पाया की मेरे नए साहब आज जल्दी ही दफ्तर आगए हैं । पारदर्शी दरवाज़े से झांकते हुए पाया की सेठजी भी पास वाली कुर्सी पर साहब के साथ बैठे हैं । 

अंदर आने की इजाज़त मांगते हुए मैं दाखिल हुआ और सेठजी व उनके पुत्र यानी मेरे साहब को सुप्रभात व शुभकामना  देकर सामने खड़ा हुआ । 

सेठजी ने साहब से मुझे मिलवाया और मुझे साहब के बारे में बताया , कुछ बातों के बाद सेठजी को बीच मे टोकते हुए साहब ने मेरे बारे में मुझसे पूछा । 

मेरे पुराने काम के एक साल के अनुभव को सुन साहब ने मेरी शैक्षणिक योग्यता के बारे में पुछा । वित्तव्यापार में स्नातक जान मुझे साहब ने बधाई दी और स्नातकोत्तर करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा :

"आज कल पढाई लिखाई बहुत जरूरी है; पढ़ा लिखा आदमी अपनी बुद्धिमता से किसी भी काम को कर या करवा सकता है । 

चेहरे पर मुस्कान व मष्तिस्क में द्वन्द लिए साहब व सेठजी से इजाज़त मांग अपनी जगह लौटा और काम में  लग गया ।


                                                                                                                          कश्यप द्विवेदी (मुसाफ़िर )

Tuesday, July 29, 2014

लिफाफा (लघु कथा )


राजू … जल्दी मेरे केबिन आओ। 
राजू घबराते  हुए  भीतर आया। 
ये लिफाफा  अभी तक तुने कुरियर नहीं किया , जानता नहीं ये सरकारी दस्तावेज़ दो दिनों में वकील साहब तक पहुँचाने हैं। अब खड़े खड़े मेरा मुंह  मत ताक और जल्दी इन्हें कुरियर कर और सुन एक चाय भिजवा फ़ौरन। 

राजू असमंजस में था पहले क्या करुँ चाय बनाऊं  या लिफाफा कुरियर लगाऊं। 

तभी अफ़सर साहब के मोबाइल की घंटी बजी , राजू को बहार दुत्कारते हुए साहब ने ऊँचे शब्दों में हर्ष और गर्मजोशी से कॉल उठाया और कहा वकील साहब दस्तावेज़ मैंने भिजवा दिए हैं , एक आद दिन में आपके पास पहुँच जाएंगे। कुछ क्षण जवाब सुन साहब बोले " वाह १५ दिन वो भी डलहौज़ी में, वाह वाह छुटीयोँ का आनंद लीजिये , मैं आपको १५ दिन के बाद कॉल करता हूँ। 

राजू ने दरवाज़े से सट कर सब ध्यान से सुना। उसे अपने असमंजस का जवाब मिल गया था।


                                                                                                               कश्यप द्धिवेदी

Thursday, July 11, 2013

समंदर .......................

समंदर .......................


साहिल की तलाश किये ..... हिचकोले खाता फिर  रहा

कितनी ख़ामोशी कितने सैलाब लिए .... झुंड से तन्हा चल रहा

जो ऱाज छुपाए लेटे हैं ... इस घने आकाश तले 

जो ख्वाब सजाए बैठे हैं ... इंतज़ार में कब रात ढले 

अक्सर मुलाकातें  होती तुझसे  ... कुछ पल ही रंगीन सही 

हम तुम कुछ कह न पाते ... शिक्वा भी तुझसे है नहीं

चट्टानों से टकराता ... घायल मै कहीं खो न जाऊं 

क्षितिज जो दुश्मन है मेरा ... गुमराह कर रहा मुझे 

आकाश से मिल इतराता कहता ... क्यूँ आस लगाऎ  बैठा है 
क्यूँ अपनी आत्मा को नमकीन बनाए बहता है
इस नीले सागर  में ... आंसू बहाए रहता है  

वो कहता  रहा  छोड़ साहिल ... मंजिल से हो जा  रूबरू

ना समझ वो क्या जाने ... मंजिल तो मुसाफिर की अमानत है 
मै तो समंदर हूँ ... मेरा महबूब तो साहिल है 
गहराइयों को समेटे बस तलाश में रहूँ ...
मै तो समंदर हूँ ... बिना महबूब कैसे जियूं





                                                                         कश्यप द्विवेदी